छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रचार-प्रसार पर 1,095 करोड़ रुपये से ज्यादा किए खर्च, जनता पूछ रही सवाल—प्रचार जरूरी था या विकास?
कांग्रेस विधायक सावित्री मनोज मंडावी के सवाल पर सरकार ने दिया विस्तृत जवाब
इतने पैसों से बदल सकती थी हजारों गांवों की तस्वीर, विधानसभा में खुला खर्च का पूरा हिसाब
रायपुर. छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र में सरकार ने स्वीकार किया कि 1 जनवरी 2024 से 31 मार्च 2026 के बीच विभिन्न योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर 1,095.20 करोड़ रुपये खर्च किए गए। कांग्रेस विधायक सावित्री मनोज मंडावी के सवाल के लिखित जवाब में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने यह जानकारी सदन में दी। करोड़ों रुपये के इस खर्च ने विकास की प्राथमिकताओं पर नई बहस छेड़ दी है।
घोषणाओं पर करोड़ों, गांव अब भी बुनियादी सुविधाओं के इंतजार में
सरकार द्वारा विधानसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार क्षेत्र प्रचार पर 414 करोड़ 1 लाख 4 हजार 531 रुपये, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर 344 करोड़ 4 लाख 57 हजार 623 रुपये, प्रिंट मीडिया पर 198 करोड़ 26 लाख 30 हजार 840 रुपये, सोशल डिजिटल मीडिया पर 55 करोड़ 81 लाख 91 हजार 658 रुपये, विशेष अवसरों पर प्रचार पर 35 करोड़ 92 लाख 41 हजार 742 रुपये, आदिवासी उपयोजना के प्रचार पर 22 करोड़ 17 लाख 79 हजार 242 रुपये, प्रकाशन मीडिया पर 19 करोड़ 17 लाख 85 हजार 671 रुपये तथा सोशल मीडिया पर 5 करोड़ 78 लाख 45 हजार 391 रुपये खर्च किए गए। यानी कुल खर्च का बड़ा हिस्सा प्रचार और जनसंपर्क गतिविधियों पर गया। दूसरी ओर प्रदेश के अनेक गांव आज भी जर्जर सड़कों, अधूरे पुलों, पेयजल संकट, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और स्कूलों की बदहाल स्थिति जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में विपक्ष यह सवाल उठा रहा है कि यदि इन हजारों करोड़ रुपये का बड़ा हिस्सा सीधे विकास कार्यों पर लगाया जाता, तो प्रदेश के कई गांवों की तस्वीर बदल सकती थी।
प्रचार ज्यादा या विकास? जनता के बीच यही बड़ा सवाल
सरकार का कहना है कि जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रचार-प्रसार आवश्यक है, लेकिन विधानसभा में सामने आए खर्च के आंकड़ों के बाद यह बहस तेज हो गई है कि क्या प्रचार पर हुआ व्यय विकास कार्यों की तुलना में अधिक प्राथमिकता बन गया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार योजनाओं के प्रचार में अधिक और जमीनी क्रियान्वयन में कम ध्यान दे रही है, जबकि सरकार इसे योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचाने की जरूरी प्रक्रिया बता रही है।
विधानसभा में खुलासा, अब जनता करेगी हिसाब
सदन में प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्रचार-प्रसार पर खर्च कोई छोटा बजट नहीं, बल्कि एक हजार करोड़ रुपये से अधिक का है। अब यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों से निकलकर आम जनता के बीच चर्चा का विषय बन गया है कि प्रदेश की प्राथमिकता प्रचार होनी चाहिए या बुनियादी विकास। विधानसभा में उठे इस सवाल के बाद सरकार के खर्च और विकास मॉडल पर बहस आने वाले दिनों में और तेज होने के आसार हैं।



