यह धान खरीदी केंद्र है या ‘विश्वास बैंक’? — डोकराभाठा समिति का खेल

00 रसूखदार किसानों को विशेष छूट

खैरागढ़. केसीजी जिले की डोकराभाठा धान खरीदी समिति में गंभीर और सुनियोजित अनियमितताओं का मामला सामने आया है। दैनिक भास्कर के पड़ताल के दौरान समिति में सरकारी नियमों का खुलेआम उल्लंघन करते पाया गया। स्थिति यह है कि छोटे किसानों और रसूखदार किसानों के लिए अलग-अलग व्यवस्था लागू है, जिससे पूरी खरीदी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

रसूखदार किसानों का धान बिना तौल सीधे रैक में

डोकराभाठा समिति में कई प्रभावशाली किसानों का धान तौले बिना ही ट्रैक्टर से सीधे रैक (फड़/लॉट) में खाली कराया जा रहा है। न तो बोरे नीचे उतारे जा रहे हैं और न ही किसी प्रकार की प्रारंभिक जांच की जा रही है। यह स्थिति समिति कर्मचारियों और रसूखदार किसानों की संभावित मिलीभगत की ओर इशारा करती है।

छोटे किसानों पर सख्ती, रसूखदारों को राहत

इसके विपरीत छोटे किसानों के साथ पूरी सख्ती बरती जा रही है। पहले उनका धान नीचे खाली कराया जाता है, फिर नमी मापी जाती है। यदि नमी तय मानक से अधिक पाई जाती है, तो किसानों को बोरा बदलने के लिए कहा जाता है। इन सभी औपचारिकताओं के बाद ही तौल की अनुमति दी जाती है। यानी एक ही समिति में दोहरी व्यवस्था साफ नजर आ रही है।

न नमी जांच, न प्रक्रिया—सीधा रैक में धान

रसूखदार किसानों के मामले में नमी जांच जैसी अनिवार्य प्रक्रिया को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। ट्रैक्टर सीधे खरीदी केंद्र में प्रवेश करता है और धान रैक में खाली हो जाता है। यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सरकारी धान खरीदी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

सूखत के पीछे एक नई वजह उजागर

केसीजी जिले में हर वर्ष सूखत (वजन में कमी) का मामला सामने आता रहा है, जिसका कारण आमतौर पर धान का लेट से उठाव बताया जाता है। लेकिन डोकराभाठा समिति में सामने आई अनियमितताओं ने सूखत के पीछे एक नई वजह उजागर की है—बिना तौल के धान खरीदी।

कई मामलों में धान को केवल विश्वास के आधार पर 40.700 किलो प्रति बोरा मानकर दर्ज किया जा रहा है, जबकि यदि बोरा 39 किलो का भी हो, तब भी उसे मानक वजन मानकर खरीदी में शामिल कर लिया जाता है और धान सीधे फड़/लॉट में खाली करा दिया जाता है।

पुराने बारदाने और प्रक्रिया से बचाव

सूत्रों के अनुसार किसान अपने घर से पुराने बारदाने में धान भरकर खरीदी केंद्र पहुंचते हैं। समिति कर्मचारियों से सांठगांठ के बाद यह धान न तौला जाता है, न नमी जांच होती है और न ही नीचे में धान को पलटा जाता है। ट्रैक्टर से सीधे धान रैक में खाली करा दिया जाता है और किसान को समिति से मिलने वाले पुराने बारदाने वापस घर ले जाने की सुविधा मिल जाती है। इससे बोरा पलटने और सत्यापन की पूरी प्रक्रिया ही समाप्त हो जाती है।

सरकारी खजाने पर सीधा असर

जब कम वजन वाला धान बिना तौल खरीदी में दर्ज हो जाता है, तो बाद में भंडारण और उठाव के दौरान सूखत अधिक दिखाई देती है। इसका सीधा असर सरकारी रिकॉर्ड पर पड़ता है और नुकसान की भरपाई अंततः शासन को करनी पड़ती है। यानी समिति की लापरवाही और मिलीभगत का बोझ सीधे सरकारी खजाने पर पड़ रहा है।

प्रबंधक का पक्ष

डोकराभाठा धान खरीदी समिति के प्रभारी प्रबंधक जगमोहन जोशी ने फोन पर बताया कि जिस अनियमितता की बात सामने आई है, वह उनके संज्ञान में पहले नहीं थी। उन्होंने कहा कि वे केवल छह दिन से प्रभार में हैं और यदि यह घटना उनकी गैर-मौजूदगी में हुई है, तो कर्मचारियों से पूछताछ की जाएगी। उनका दावा है कि सामान्यतः समिति में नमी जांच, तौल और अन्य प्रक्रियाएं नियमों के अनुसार कराई जाती हैं।