खैरागढ़ में फर्जी दस्तावेज के सहारे रजिस्ट्री का आरोप, पटवारी तहसीलदार पर एफआईआर दर्ज करने की मांग

खैरागढ़ में फर्जी दस्तावेज के सहारे रजिस्ट्री का आरोप, पटवारी तहसीलदार पर एफआईआर दर्ज करने की मांग

खैरागढ़. जिले में सोनेसरार क्षेत्र की जमीन को लेकर एक गंभीर और सनसनीखेज मामला सामने आया है। खैरागढ़ निवासी मनीष सोनी ने 7 नवंबर को जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को विस्तृत शिकायत सौंपते हुए आरोप लगाया है कि सिविल न्यायालय द्वारा पहले ही निरस्त की जा चुकी सोनेसरार स्थित खसरा नंबर 182/6 की भूमि को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दोबारा जीवित कर 18 अगस्त 2021 को रजिस्ट्री करा दी गई। शिकायत में तत्कालीन तहसीलदार, पटवारी और अन्य व्यक्तियों पर मिलीभगत, पद के दुरुपयोग और अवैध आर्थिक लाभ लेने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

शिकायतकर्ता के अनुसार, अपर जिला न्यायालय द्वारा 22 दिसंबर 2015 को खसरा नंबर 182/6 (रकबा 1.20 एकड़) को स्पष्ट रूप से निरस्त कर दिया गया था। इसके बावजूद बिना किसी नए न्यायालयीन आदेश, बिना कलेक्टर या एसडीएम की अनुमति और बिना सार्वजनिक सूचना के कथित रूप से फर्जी ऋण पुस्तिका, नक्शा और नामांतरण आदेश तैयार कर रजिस्ट्री करा दी गई। आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया सुनियोजित साजिश के तहत की गई, ताकि सोनेसरार की विवादित भूमि को अवैध रूप से बेचा जा सके।

मनीष सोनी ने शिकायत में यह भी बताया कि सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेज—ऋण पुस्तिका, नक्शा और नामांतरण आदेश—सभी 14 अगस्त 2014 और 12 अगस्त 2014 के पुराने रिकॉर्ड पर आधारित हैं, जिन्हें न्यायालय पहले ही अमान्य घोषित कर चुका है। इसके बावजूद इन्हीं निरस्त दस्तावेजों को आधार बनाकर 182/6 खसरे की रजिस्ट्री कराई गई, जो सीधे तौर पर न्यायालय के आदेशों की अवहेलना और रिकॉर्ड से छेड़छाड़ का मामला बनता है।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि सोनेसरार प्रकरण को दबाने और शिकायतकर्ता को डराने के लिए लगातार प्रशासनिक और पुलिस स्तर पर दबाव बनाया गया। झूठी शिकायतें, बार-बार थाने और कार्यालय बुलाना तथा अन्य जमीन मामलों में उलझाकर मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना दी गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि इसी दबाव और व्यस्तता का फायदा उठाकर 182/6 खसरे की फर्जी रजिस्ट्री चुपचाप करा दी गई।

सोनेसरार मामले के साथ-साथ मनीष सोनी ने यह भी आरोप लगाया है कि इसी नेटवर्क के चलते उनकी पिपरिया स्थित वैध खरीदी गई जमीन के ऑनलाइन रिकॉर्ड में जानबूझकर देरी की गई और फर्जी बैंक ऋण का बोझ डाला गया। हालांकि शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया है कि सोनेसरार का मामला सबसे गंभीर है, क्योंकि इसमें न्यायालय द्वारा निरस्त भूमि को फिर से बेचने का प्रयास किया गया, जो सीधे तौर पर राजस्व व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।

शिकायतकर्ता ने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक से मांग की है कि सोनेसरार खसरा 182/6 प्रकरण की प्राथमिकता के आधार पर उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, सभी संबंधित राजस्व अधिकारियों, बैंक कर्मियों और निजी व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता 2023 की धाराओं के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए तथा फर्जी रजिस्ट्री को निरस्त कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।

तहसीलदार आशीष देवहरी के अनुसार, जिस भूमि के नामांतरण का आवेदन प्रस्तुत किया गया है, उस पर सिविल न्यायालय से निर्णय आने के बाद एक पक्ष ने अपने पक्ष में आदेश बताते हुए नामांतरण की मांग की थी। हालांकि, दूसरे पक्ष द्वारा उसी निर्णय के विरुद्ध ऊपरी अदालत—अपर जिला न्यायालय (एडीजे/सेशन कोर्ट)—में विधिवत अपील दायर कर दी गई है, जिसकी प्रति भी कार्यालय में प्रस्तुत की गई है।

अधिकारी ने स्पष्ट किया कि जब कोई मामला ऊपरी न्यायालय में विचाराधीन (पेंडिंग) हो, तब तक नामांतरण जैसी प्रशासनिक कार्रवाई करना विधिसंगत नहीं होता। यदि अपील लंबित रहते हुए नामांतरण कर दिया जाए और बाद में ऊपरी अदालत से विपरीत निर्णय आ जाए, तो प्रशासनिक अधिकारी को स्वयं पक्षकार बनाकर न्यायालय में घसीटा जा सकता है। इसी कारण, कानूनी जटिलताओं से बचने और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान बनाए रखने के लिए फिलहाल नामांतरण की कार्रवाई रोकी गई है और अंतिम निर्णय आने के बाद ही आगे की प्रक्रिया की जाएगी।