मध्यान्ह भोजन रसोईयों का आक्रोश: कलेक्टर दर मानदेय और स्थायित्व की मांग को लेकर नया रायपुर में धरना
राजनांदगांव. छत्तीसगढ़ में स्कूलों की मध्यान्ह भोजन योजना को तीन दशक से अपने श्रम से जीवित रखने वाली रसोईयों का सब्र अब जवाब दे रहा है। बेहद कम मानदेय, अस्थिर रोजगार और वर्षों से लंबित मांगों के खिलाफ मोहला–मानपुर–अंबागढ़ चौकी जिले की रसोईयां सड़कों पर उतर आई हैं। जिला अध्यक्ष बालाराम कल्लो के नेतृत्व में बड़ी संख्या में रसोईया नया रायपुर के तूता मैदान में धरने पर बैठी हैं।
28 वर्षों की सेवा, फिर भी न्यूनतम सम्मान नहीं
साल 1995 में केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई मध्यान्ह भोजन योजना का उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाना था। 2007 में इसे माध्यमिक स्तर तक विस्तारित किया गया। लेकिन योजना की रीढ़ कही जाने वाली रसोईयों की हालत आज भी दयनीय बनी हुई है। शासन के निर्देशानुसार ग्राम पंचायतों के माध्यम से ग्राम सभाओं में नियुक्त रसोईया वर्षों तक 15 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी पर काम करती रहीं। वर्तमान में उन्हें लगभग 2000 रुपये प्रतिमाह मिलते हैं—जो औसतन 66 रुपये प्रतिदिन बैठता है।
पांच घंटे काम, फिर भी ‘अंशकालीन’ का ठप्पा
रसोईयों का कहना है कि वे रोज़ाना सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे तक करीब पांच घंटे काम करती हैं। इसके बावजूद उन्हें न तो नियमित कर्मचारी का दर्जा मिलता है और न ही न्यूनतम मानदेय। अधिकांश रसोईया गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही हैं और वर्षों से इसी काम को एकमात्र सहारा मानकर जुड़ी हुई हैं।
दर्ज संख्या के नाम पर मनमानी, रोजगार पर संकट
आरोप है कि कई स्कूलों में छात्रों की दर्ज संख्या कम बताकर वर्षों से कार्यरत रसोईयों को हेडमास्टर या महिला समूहों के माध्यम से काम से हटा दिया जाता है। पीड़ित रसोईयों ने कई बार शासन से न्याय की गुहार लगाई, लेकिन ठोस समाधान नहीं मिला। इसका असर मोहला–मानपुर–अंबागढ़ चौकी जिले के स्कूलों में स्पष्ट दिख रहा है।
तीन प्रमुख मांगें, एकजुट संघर्ष
धरने पर बैठी रसोईयों ने राज्य शासन और मुख्यमंत्री से तीन स्पष्ट मांगें रखी हैं जिसमें कलेक्टर दर पर मानदेय दिया जाए, ताकि न्यूनतम जीवनयापन संभव हो। छात्र संख्या कम होने के आधार पर रसोईयों को हटाने की प्रथा तत्काल बंद की जाए। अंशकालीन व्यवस्था समाप्त कर पूर्णकालीन दर्जा दिया जाए।
योजना चले, तो रसोईया बचे”—धरने से सरकार को संदेश
रसोईयों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं होता, आंदोलन जारी रहेगा। धरने में शामिल महिलाओं ने साफ कहा कि मध्यान्ह भोजन योजना की सफलता उनके श्रम पर टिकी है, लेकिन सम्मान और सुरक्षा के बिना यह श्रम टिकाऊ नहीं।



