इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा परिवार पर राष्ट्रीय विमर्श का शुभारंभ

इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा परिवार पर राष्ट्रीय विमर्श का शुभारंभ

खैरागढ़. इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में “भारतीय भाषा परिवार का राष्ट्रीय एकता में अवदान” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य शुभारंभ 9 जनवरी को दरबार हॉल में हुआ। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा रहीं, जबकि अध्यक्षता कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. राजन यादव ने की। दीप प्रज्वलन और अतिथियों के स्वागत के साथ सम्मेलन की औपचारिक शुरुआत हुई। स्वागत भाषण संयोजक डॉ. कौस्तुभ रंजन ने दिया और इसके बाद मुख्य वक्ता प्रख्यात भाषाविद प्रो. (डॉ.) चित्तरंजन कर ने अपना कीनोट संबोधन प्रस्तुत किया।

कुलपति प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा ने कहा कि भारतीय भाषाएं हमारी सांस्कृतिक पहचान की आत्मा हैं और विविधता में एकता का सबसे सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने कहा कि भाषा के माध्यम से ही किसी क्षेत्र की संस्कृति, परंपरा और सोच झलकती है, और इस तरह के सम्मेलन भारतीयता को और अधिक सशक्त बनाते हैं। मुख्य वक्ता प्रो. (डॉ.) चित्तरंजन कर ने भारत की विभिन्न भाषाई शैलियों, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि किस प्रकार भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय एकता को मजबूत करती हैं। इसके साथ ही देश के विभिन्न प्रांतों से आए विद्वानों ने भारतीय भाषाओं की भूमिका पर अपने शोध और विचार साझा किए, जिनमें प्रो. श्रीराम परिहार और डॉ. रमेश अनुपम प्रमुख रहे।

सम्मेलन के पहले दिन की संध्या सांस्कृतिक रंगों से सजी रही। विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम में लोक संगीत विभाग की छात्राओं ने पंजाब का भांगड़ा, गुजरात का गरबा और छत्तीसगढ़ के बैगा लोकनृत्य सहित विभिन्न प्रांतों के नृत्यों की शानदार प्रस्तुति दी। इसके बाद भरतनाट्यम विभाग के विद्यार्थियों ने अलारितु और राग नट भैरवी सहित पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस सांस्कृतिक संध्या ने भारतीय भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हुए सम्मेलन को यादगार बना दिया।