छुईखदान के ‘आशा हॉस्पिटल’ का मामला विधानसभा में गूंजा

छुईखदान के ‘आशा हॉस्पिटल’ का मामला  विधानसभा में गूंजा

खैरागढ़. विधानसभा के शीतकालीन सत्र में तीसरे दिन खैरागढ़ विधायक यशोदा निलाम्बर वर्मा ने विकासखंड छुईखदान में संचालित निजी अस्पताल “आशा हॉस्पिटल” के खिलाफ प्राप्त शिकायतों को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया। विधायक ने लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री से सीधे सवाल किए कि क्या अस्पताल संचालक के विरुद्ध विभाग को शिकायतें मिली हैं, वे कब प्राप्त हुईं और उन पर क्या कार्रवाई की गई। साथ ही उन्होंने यह भी पूछा कि क्या अस्पताल संचालक एक शासकीय मेडिकल कॉलेज में पदस्थ रहते हुए निजी अस्पताल का संचालन कर रहे हैं और क्या यह सेवा नियमों का उल्लंघन है।

लोक स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने सदन में स्वीकार किया कि आशा हॉस्पिटल के खिलाफ कई शिकायतें प्राप्त हुई है। मंत्री ने बताया कि छुईखदान में एक गर्भवती महिला और उसके गर्भस्थ शिशु की संदिग्ध मौत, आयुष्मान भारत योजना के नाम पर भ्रामक प्रचार-प्रसार और गैर-सूचीबद्ध निजी अस्पताल द्वारा निःशुल्क सोनोग्राफी के दावे जैसी शिकायतें कलेक्टर कार्यालय और राज्य नोडल एजेंसी तक पहुंची हैं। इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए संबंधित चिकित्सक के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है, जो वर्तमान में प्रक्रियाधीन है।

यशोदा वर्मा के दूसरे प्रश्न के उत्तर में मंत्री ने बताया कि संबंधित चिकित्सक डॉ. जितेन्द्र कुमार ताम्रकार, पं. जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय (मेकाहारा), रायपुर के रेडियोडायग्नोसिस विभाग में 14 फरवरी 2017 से नियमित रजिस्ट्रार के पद पर पदस्थ हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि चिकित्सक एन.पी.ए. (गैर-अभ्यास भत्ता) नहीं ले रहे हैं और आशा हॉस्पिटल का संचालन 14 मार्च 2023 से किया जा रहा है। हालांकि जांच प्रतिवेदन में यह तथ्य भी सामने आया कि शासकीय पद पर पदस्थ रहते हुए निजी अस्पताल में स्त्रीरोग विशेषज्ञ के रूप में कार्य करने का मामला नियमों की कसौटी पर जांच योग्य है, जिसके लिए चिकित्सा शिक्षा विभाग को पत्र भेजने की अनुशंसा की गई है।

शिकायतों की जांच को लेकर मंत्री ने बताया कि जिला स्तर और राज्य स्तर पर अलग-अलग जांच समितियों का गठन किया गया। जांच में यह सामने आया कि आशा हॉस्पिटल आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत सूचीबद्ध अस्पताल नहीं है, इसके बावजूद अस्पताल परिसर और नगर क्षेत्र में “आयुष्मान कार्ड दिखाइए, सोनोग्राफी फ्री कराइए” जैसे बैनर और पोस्टर लगाए गए थे, जिसे प्रथम दृष्टया भ्रामक प्रचार माना गया। वहीं गर्भवती महिला हेमा साहू की मृत्यु के मामले में यह भी सामने आया कि अस्पताल में आईसीयू जैसी समुचित सुविधा उपलब्ध नहीं थी, बावजूद इसके हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के मरीज को हायर सेंटर रेफर नहीं किया गया। जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि मौत में लापरवाही की अंतिम पुष्टि फोरेंसिक साइंस लैब की रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगी।

इस तरह यशोदा वर्मा के सवालों ने निजी अस्पतालों की निगरानी, शासकीय चिकित्सकों की जवाबदेही और आयुष्मान योजना के दुरुपयोग जैसे गंभीर मुद्दों को विधानसभा के केंद्र में ला दिया। सरकार ने सदन में यह भरोसा दिलाया कि जांच रिपोर्ट और अनुशंसाओं के आधार पर दोषियों के खिलाफ नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी और पूरे मामले पर अंतिम निर्णय लंबित जांच रिपोर्टों के बाद लिया जाएगा।