साहब के 'रसोड़े' में रसूख की मलाई: देवरी पशु चिकित्सालय में ताला, राजनांदगांव में ड्यूटी बजा रहा स्टाफ; बेजुबान राम भरोसे
संवाददाता -मंदीप सिंह
खैरागढ़। छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी योजनाएं और बेजुबान पशुओं के संवर्धन के सरकारी दावे जिला केसीजी के ग्राम देवरी में दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। यहाँ का पशुपालन विभाग कार्यालय वर्तमान में केवल एक सरकारी भवन की शोभा बढ़ा रहा है, क्योंकि यहाँ पदस्थ अमला अपनी मूल पदस्थापना को दरकिनार कर कथित तौर पर राजनांदगांव मुख्यालय में रसूख की मलाई काट रहा है। ग्रामीणों द्वारा लगाए जा रहे गंभीर आरोपों के मुताबिक, यहाँ पदस्थ कर्मचारी कंचन कौर राजपूत सहित अन्य स्टाफ अपनी मूल जिम्मेदारियों को निभाने के बजाय राजनांदगांव मुख्यालय में डीडीवीएस डॉ. अनुप चटर्जी के संरक्षण में ‘अटैचमेंट’ का सुख भोग रहे हैं। विडंबना यह है कि सत्र 2025-26
शुरू होने के बाद से अब तक इस कार्यालय में कंचन कौर राजपूत या किसी अन्य कर्मचारी की भौतिक उपस्थिति दर्ज नहीं होने की चर्चा है, जिससे ग्रामीणों को केवल दफ्तर के बाहर लटके सरकारी तालों के दर्शन हो रहे हैं।
नवनिर्मित जिला केसीजी का गठन होने के बावजूद यहाँ के कर्मचारियों का राजनांदगांव मोह प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है, जो सीधे तौर पर अनुशासनहीनता के साथ-साथ वित्तीय अनियमितता की ओर भी इशारा करता है। चर्चा है कि कार्यस्थल से नदारद रहने के बावजूद इन कर्मचारियों का वेतन नियमित रूप से आहरित किया जा रहा है, जबकि स्थानीय पशुपालक बीमार मवेशियों के उपचार और सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। ग्रामीण उमेश कोटले का आक्रोश इस अव्यवस्था पर साफ झलकता है, जिनका कहना है कि सरकार की योजनाएं केवल फाइलों तक सीमित रह गई हैं और देवरी के अस्पताल में तैनात अमले की शक्ल देखे महीनों बीत चुके हैं। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि रसूखदार कर्मचारी राजनांदगांव में साहबों की कथित सेवा में व्यस्त रहेंगे, तो देवरी के बेजुबान मवेशियों का उपचार कौन करेगा।
इस पूरे 'अटैचमेंट खेल' और कथित लापरवाही पर जब राजनांदगांव के उप संचालक डॉ. अनुप चटर्जी का आधिकारिक पक्ष जानने के लिये कई बार संपर्क करने का प्रयास किया, तो उन्होंने कॉल रिसीव करना उचित नहीं समझा। एक जिम्मेदार पद पर आसीन अधिकारी की यह चुप्पी और संचार से दूरी कंचन कौर राजपूत जैसे कर्मचारियों को दिए जा रहे कथित विभागीय संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े करती है। त्रस्त ग्रामीणों ने अब इस पूरे मामले की वस्तुस्थिति से कलेक्टर को अवगत कराने हेतु लिखित शिकायत की तैयारी कर ली है, ताकि व्यवस्था को 'राम भरोसे' छोड़ने वाले जिम्मेदारों पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।



