“तीन साल नहीं, बीस साल का इंतज़ार” — पदोन्नति विवाद पर शिक्षक कौशल श्रीवास्तव का पलटवार

“तीन साल नहीं, बीस साल का इंतज़ार” — पदोन्नति विवाद पर शिक्षक कौशल श्रीवास्तव का पलटवार

संघर्ष की कहानी: 2006 से लंबित अधिकार अब मिला

खैरागढ़. शिक्षक कौशल कुमार श्रीवास्तव की हालिया पदोन्नति को लेकर भले ही विवाद खड़ा किया जा रहा हो, लेकिन उनके अनुसार यह अचानक मिली सुविधा नहीं बल्कि लगभग दो दशक लंबे संघर्ष का परिणाम है। वे 1998 नियुक्ति बैच के शिक्षक हैं और उनका कहना है कि वर्ष 2006 में ही उन्हें नियमों के अनुसार पदोन्नति मिल जानी चाहिए थी, जबकि उनके कई कनिष्ठ शिक्षकों को उस समय पदोन्नत कर दिया गया। बार-बार आवेदन, विभागीय पत्राचार और व्यक्तिगत प्रयासों के बावजूद जब न्याय नहीं मिला, तब उन्होंने कानूनी मार्ग अपनाया।

हाईकोर्ट ने दिया था विचार करने का निर्देश

23 सितंबर 2016 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर ने उनके प्रकरण पर सुनवाई करते हुए संबंधित प्राधिकारी को अभ्यावेदन पर नियमानुसार विचार कर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि शिक्षक पात्र है तो उसके मामले पर कारण सहित आदेश पारित किया जाए। श्रीवास्तव का कहना है कि इस आदेश के बाद भी तत्काल लाभ नहीं मिला, लेकिन उनके अधिकार को वैधानिक रूप से स्वीकार किया गया, जिसने आगे की प्रक्रिया का आधार तैयार किया।

पत्र वरिष्ठता” बना पदोन्नति का वास्तविक आधार

श्रीवास्तव के अनुसार उनकी पदोन्नति 2022 की सेवा अवधि के आधार पर नहीं, बल्कि 2006 से प्रदान की गई पत्र वरिष्ठता के आधार पर हुई है। विभाग ने यह माना कि उनकी पदोन्नति उस समय होनी चाहिए थी लेकिन किसी कारण से छूट गई। ऐसे मामलों में शासन पूर्व तिथि से वरिष्ठता प्रदान करता है ताकि भविष्य की पदोन्नति में नुकसान की भरपाई हो सके। उनका कहना है कि इसी वैधानिक वरिष्ठता के कारण बाद की पदोन्नति प्रक्रिया में उन्हें वरिष्ठ मानकर शामिल किया गया।

अनुभव विवाद पर स्पष्टीकरण

कुछ लोगों द्वारा 5 वर्ष के अनुभव की शर्त का हवाला देकर सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन श्रीवास्तव का कहना है कि यह शर्त वास्तविक नियुक्ति तिथि से नहीं बल्कि मान्य वरिष्ठता से संबंधित होती है। यदि किसी कर्मचारी को पूर्व तिथि से वरिष्ठता दी जाती है, तो पदोन्नति के अवसर भी उसी आधार पर निर्धारित होते हैं। उनका तर्क है कि विभागीय अधिकारियों ने नियमों का परीक्षण करने के बाद ही उनका नाम सूची में शामिल किया, इसलिए इसे नियमों की अनदेखी कहना उचित नहीं है।

भ्रामक प्रचार से आहत, लेकिन शांत”

मीडिया में चल रही खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए श्रीवास्तव ने कहा कि बिना पूरी जानकारी के आरोप लगाना दुखद है। उन्होंने बताया कि वे लंबे समय तक शिक्षक संगठन में सक्रिय रहे और हमेशा सहकर्मियों के हित में कार्य किया है। उनके अनुसार यदि किसी को संदेह है तो वह विभागीय रिकॉर्ड देख सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि वे फिलहाल विवाद बढ़ाने के बजाय तथ्यों के सामने आने का इंतजार कर रहे हैं।

दूसरों के लिए भी खुला रास्ता

श्रीवास्तव का कहना है कि उनका मामला केवल व्यक्तिगत लाभ का नहीं बल्कि उन सभी शिक्षकों के लिए उदाहरण है जिनकी पदोन्नति किसी कारण से छूट गई। यदि किसी शिक्षक के कनिष्ठ को पहले पदोन्नति मिल गई हो, तो वह भी आवेदन कर पूर्व तिथि से वरिष्ठता का लाभ प्राप्त कर सकता है। उन्होंने सहयोग का आश्वासन देते हुए कहा कि नियमों के भीतर रहकर अधिकार प्राप्त करना हर कर्मचारी का हक है, और उनका मामला इसी प्रक्रिया का परिणाम है, न कि किसी विशेष सुविधा का।

पत्र वरिष्ठता के आधार पर जिले में अन्य शिक्षकों को भी पदोन्नति मिली है। मुझे भी इसी आधार पर पदोन्नति मिली है।”

— कौशल श्रीवास्तव, प्रधान पाठक, मिडिल स्कूल ठंडार