विक्रांत सिंह के भाषण वायरल होने के बाद किसान अधिकार संघर्ष समिति ने उनके भाषण का दिया जवाब
खैरागढ़. उदान में कुछ दिन पहले दिया गया जिला पंचायत उपाध्यक्ष विक्रांत सिंह का भाषण अब लाइमस्टोन परियोजना से जुड़े विवाद का केंद्र बन गया है। करीब 9 मिनट 15 सेकेंड का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रभावित किसानों के बीच तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। क्षेत्र में भाजपा के प्रभावशाली नेता माने जाने वाले विक्रांत सिंह ने इस मुद्दे पर पहली बार सार्वजनिक मंच से अपनी बात रखी, लेकिन किसान अधिकार संघर्ष समिति द्वारा प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए आरोप लगाया है कि यह बयान राहत देने के बजाय आक्रोश बढ़ाने वाला साबित हो रहा है।
वायरल वीडियो में विक्रांत सिंह किसानों को संबोधित करते हुए कहते नजर आते हैं कि सीमेंट फैक्ट्री के नाम पर किसी भी गांव की एक इंच जमीन तब तक अधिग्रहित नहीं हो सकती, जब तक किसान खुद जमीन न बेचें। उन्होंने यह भी कहा कि कोई गांव उजड़ेगा नहीं और जबरन जमीन अधिग्रहण की कोई संभावना नहीं है। हालांकि, किसानों का कहना है कि यह बयान आधा सच है और पूरी तस्वीर सामने नहीं रखी गई।
फैक्ट्री खुलेगी या नहीं—इस सवाल से किनारा
किसानों के मुताबिक भाषण में जमीन अधिग्रहण पर लंबी चर्चा जरूर हुई, लेकिन सबसे अहम सवाल—फैक्ट्री खुलेगी या नहीं—पर नेता ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया। वीडियो में स्वयं यह कहते सुना जा सकता है कि वह इस विषय में अभी नहीं जा रहे। किसानों का आरोप है कि यही असली मुद्दा है, जिससे जानबूझकर बचा गया, ताकि भ्रम की स्थिति बनी रहे।
आंदोलन सही, लेकिन… वाला बयान बना नाराज़गी की वजह
विक्रांत सिंह ने मंच से किसानों के आंदोलन को जायज बताया, लेकिन आगे यह कहकर विवाद बढ़ा दिया कि किसी एक व्यक्ति या किसी सिंगल नेता ने भाजपा के नेताओं के पास सहयोग मांगने नहीं पहुंचा, क्योंकि मामला राजनीति का था। किसान अधिकार संघर्ष समिति ने इस टिप्पणी को घमंड से भरा रवैया बताया है। किसानों का कहना है कि जनप्रतिनिधि का काम इंतजार करना नहीं, बल्कि समस्या देखकर खुद आगे आना होता है।
दानिया से रोड अतरिया तक नेता बुलाने का आरोप
वायरल भाषण में यह दावा भी किया गया कि आंदोलन के दौरान तय किया गया था कि दानिया से रोड अतरिया तक के नेताओं को ही बुलाया जाएगा। किसानों का आरोप है कि इस बयान के जरिए आंदोलन को सीमित और कमजोर दिखाने की कोशिश की गई। उनका कहना है कि आंदोलन पूरी तरह किसान-केंद्रित था, न कि किसी राजनीतिक दायरे में बंधा हुआ।
नीलामी रद्द करने के श्रेय पर सवाल
विक्रांत सिंह ने यह भी कहा कि हनईबंद, रेमड़वा, जगमड़वा और मरदकठेरा की नीलामी सरकार पहले ही रद्द कर चुकी थी और वहां कोई आंदोलन नहीं हुआ। इस दावे पर किसानों ने सवाल खड़े किए हैं। किसानों का कहना है कि प्रशासनिक रिकॉर्ड यह दर्शाते हैं कि किसानों के आवेदन और विरोध के बाद ही नीलामी प्रक्रिया पर निर्णय लिया गया। ऐसे में इसे सरकार या किसी नेता की उपलब्धि बताना किसानों के संघर्ष का श्रेय हड़पने जैसा है।
गांवों को बांटने की राजनीति का आरोप
भाषण में कुछ गांवों को प्रभावित और कुछ को अप्रभावित बताकर नाम गिनाए जाने पर भी कड़ा विरोध दर्ज किया गया है। किसानों का कहना है कि खनन और पर्यावरणीय प्रभाव किसी एक गांव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे क्षेत्र पर पड़ता है। गांवों के नाम लेकर आंदोलन पर सवाल उठाना फूट डालने की राजनीति का संकेत है।
किसान अधिकार संघर्ष समिति के संरक्षक गिरवर जंघेल, उपाध्यक्ष मन्नू चंदेल, उपाध्यक्ष संजू चंदेल ने समिति का पक्ष रखते हुए उनके बयान का जवाब दिया
विक्रांत सिंह का बयान- फैक्ट्री खुलेगी या नहीं, इस विषय में अभी मैं नहीं जा रहा।
संघर्ष समिति का जवाब- यही सबसे बड़ा सवाल है। जब सरकार आपकी है, तो स्पष्ट जवाब क्यों नहीं? किसान गोल–मोल आश्वासन नहीं, सीधा निर्णय चाहते हैं। यह टालने वाली भाषा जिम्मेदारी नहीं, भ्रम पैदा करने का तरीका है।
विक्रांत सिंह का बयान- किसानों का विरोध बिल्कुल सही है, आंदोलन होना चाहिए।
संघर्ष समिति का जवाब- अगर आंदोलन सही है, तो आपने उसे समर्थन क्यों नहीं दिया? मंच से सही कहना आसान है, लेकिन मैदान में साथ खड़े होना ही असली नेतृत्व होता है।
विक्रांत सिंह का बयान- आंदोलन में तय किया गया कि दानिया से रोड अतरिया तक के नेताओं को ही बुलाया जाएगा।
संघर्ष समिति का जवाब- यह सरासर झूठ है। आंदोलन में किसी नेता के लिए कोई सीमा तय नहीं की गई। यह आरोप किसानों को आपस में बांटने और आंदोलन को कमजोर दिखाने की कोशिश है। और स्वयं को बचाने का जवाब है।
विक्रांत सिंह का बयान- कोई भी व्यक्ति हमारे पास सहयोग मांगने नहीं आया।
संघर्ष समिति का जवाब- जनप्रतिनिधि मदद मांगने का इंतजार नहीं करता, वह खुद आगे बढ़ता है। ‘कोई आया नहीं’ कहना सेवा भाव नहीं, बल्कि अहंकार को दर्शाता है।
विक्रांत सिंह का बयान- हनईबंद, रेमड़वा, जगमड़वा और मरदकठेरा की नीलामी आंदोलन के कारण नहीं, सरकार, पार्टी और भाजपा के कार्यकर्ताओं के कहने पर रद्द कर दी थी।
संघर्ष समिति का जवाब- एसडीएम का लिखित पत्र बताता है कि 6 दिसंबर 2025 के किसान आंदोलन के आवेदन के बाद ही निर्णय लिया गया। यानी नीलामी किसानों के दबाव से रद्द हुई, किसी नेता की कृपा से नहीं। श्रेय लेने की यह कोशिश किसानों के संघर्ष का अपमान है।
विक्रांत सिंह का बयान- हनईबंद, रेमड़वा, जगमड़वा के गांवों में नीलामी रद्द होने से पहले कोई आंदोलन नहीं हुआ।
संघर्ष समिति का जवाब- आंदोलन में 55 गांव शामिल थे, जिनमें हनईबंद, रेमड़वा, जगमड़वा गांव भी थे। यह कहना कि आंदोलन नहीं हुआ, किसानों की मौजूदगी और संघर्ष को झुठलाने जैसा है।
विक्रांत सिंह का बयान- नेताओं को नहीं बुलाने की बात कही जाती है और फिर कहा जाता है – समर्थन नहीं तो वोट नहीं।”
संघर्ष समिति का जवाब- किसी नेता को बुलाने की जरूरत नहीं है क्षेत्र की समस्या को देखकर नेताओं को स्वयं सामने आना चाहिए। यह धमकी नहीं, चेतावनी है। जो नेता किसान हित में खड़ा नहीं होगा, उससे वोट की उम्मीद करना ही गलत है। वोट भी किसान का अधिकार है, एहसान नहीं।
विक्रांत सिंह का बयान- आंदोलन का नेतृत्व ऐसे लोग कर रहे हैं जिनकी जमीन प्रभावित नहीं हो रही।
संघर्ष समिति का जवाब- पर्यावरण की लड़ाई किसी एक खेत की नहीं होती। जब हवा, पानी और स्वास्थ्य प्रभावित होंगे, तो पूरा क्षेत्र प्रभावित होगा। ‘बाहरी’ कहकर लोगों को बांटना घमंड भरी राजनीति है। स्वयं विक्रांत सिंह ही निर्वाचन क्षेत्र के निवासी नहीं है ऐसे में संघर्षरत किसानों को बाहरी बताना गलत है।
विक्रांत सिंह का बयान- ये नीलामियां भाजपा सरकार ने रद्द कराई हैं।”
संघर्ष समिति का जवाब- नीलामी भाजपा ने रद्द नहीं कराई,—इसे किसानों की एकजुट ताकत ने रद्द कराया। अगर सच में भाजपा किसानों के साथ हैं, तो पूरी परियोजना को ही रद्द कर दिखाइए।



