टीन शेड में कमीशन का खेल, विकास कार्यों में सरपंचों की भूमिका सीमित!
स्वीकृति के नाम पर शुरू होता है दबाव का खेल
खैरागढ़. जिले की कई ग्राम पंचायतों में इन दिनों टीन शेड और अन्य निर्माण कार्यों को लेकर सरपंचों के बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है। नाम न छापने की शर्त पर कई सरपंचों ने आरोप लगाया है कि पंचायतों में स्वीकृत विकास कार्यों पर उनका नियंत्रण नाम मात्र का रह गया है। उनका कहना है कि काम स्वीकृत होते ही कुछ प्रभावशाली लोग और कथित ठेकेदार पंचायत पहुंचकर दावा करने लगते हैं कि उन्होंने ही कार्य स्वीकृत कराया है, इसलिए निर्माण कार्य भी वही करेंगे। विरोध करने पर काम निरस्त कराने या अड़ंगा लगाने की चेतावनी तक दी जाती है।
सरपंच बने सिर्फ हस्ताक्षर करने वाली एजेंसी
सरपंचों का आरोप है कि पंचायतों को केवल कागजों में कार्य एजेंसी बनाकर रखा गया है। निर्माण कार्य से लेकर सामग्री व्यवस्था और मजदूरी भुगतान तक का नियंत्रण बाहरी लोगों के हाथों में रहता है। पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका केवल दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने और फाइलों को एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक पहुंचाने तक सीमित हो गई है। कई सरपंचों का कहना है कि उन्हें जनपद कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जबकि वास्तविक काम किसी और के द्वारा कराया जाता है।
टीन शेड निर्माण में सबसे अधिक शिकायतें
जानकारी के अनुसार जिले की लगभग 56 पंचायतों में विभिन्न मदों से टीन शेड निर्माण कार्य स्वीकृत हुए हैं। इनमें स्कूलों के प्रार्थना शेड, सामुदायिक मंच और अन्य सार्वजनिक निर्माण शामिल हैं। सरपंचों का आरोप है कि इन कार्यों में कमीशनखोरी की शिकायतें सबसे अधिक सामने आ रही हैं। कथित तौर पर कुछ लोग कार्य दिलाने के नाम पर पहले कमीशन तय करते हैं, फिर निर्माण कार्य अपने लोगों से करवाते हैं और पंचायत को केवल औपचारिक एजेंसी बनाकर रखते हैं।

बोर खनन और अन्य कार्यों में भी उठे सवाल
केवल टीन शेड ही नहीं, बल्कि बोर खनन और अन्य विकास कार्यों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ सरपंचों का कहना है कि कई योजनाओं में पंचायतों की भूमिका केवल नाम के लिए रह गई है। वास्तविक कार्य निजी स्तर पर संचालित किए जा रहे हैं, जिससे पंचायत राज व्यवस्था की मूल भावना प्रभावित हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों के क्रियान्वयन को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।

सरपंच संघ की नाराजगी के बाद भी छाई खामोशी
कुछ समय पहले सरपंच संघ की बैठकों में भी कमीशनखोरी और पंचायतों की घटती भूमिका को लेकर नाराजगी जताई गई थी। उच्च अधिकारियों और वरिष्ठ नेताओं तक शिकायत पहुंचाने की चर्चा भी हुई थी, लेकिन उसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। कई सरपंचों का कहना है कि खुलकर विरोध करने पर विकास कार्य प्रभावित होने का डर बना रहता है। ऐसे में अधिकांश जनप्रतिनिधि मन मसोसकर चुप्पी साधे हुए हैं, जबकि पंचायतों की स्वायत्तता और विकास कार्यों की पारदर्शिता को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं।



