केसीजी के जंगलों व खेती जमीन पर मंडराया खनन का खतरा, 2800 हेक्टेयर में दांव पर लगा पर्यावरण 

केसीजी के जंगलों व खेती जमीन पर मंडराया खनन का खतरा, 2800 हेक्टेयर में दांव पर लगा पर्यावरण 

रिपोर्टर उमेश्वर वर्मा 

सरकार ने 5 कंपनियों को आवंटित किए लौह अयस्क व चूना पत्थर के बड़े ब्लॉक; रोजगार के दावों के बीच ग्रामीणों में बढ़ी बेचैनी

खैरागढ़. खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (केसीजी) जिले में विकास के नाम पर खनन का ऐसा ‘मेगा प्लान’ तैयार किया गया है, जिसने हजारों एकड़ जंगल और स्थानीय जनजीवन पर संकट के बादल घेर लिए हैं। विधानसभा में उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, जिले में करीब 2798 हेक्टेयर (लगभग 6900 एकड़) में लौह अयस्क और चूना पत्थर खनन के लिए ब्लॉक चिन्हित किए गए हैं। इनमें से कई बड़े ब्लॉक निजी कंपनियों को आवंटित किए जा चुके हैं, जिससे विकास और पर्यावरण के बीच जंग तेज हो गई है।

5 कंपनियों को सौंपे गए खनन के ठेके

जिले में खनन गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए 5 प्रमुख खनिज ब्लॉकों का आवंटन कर दिया गया है। इनमें सबसे विवादित संडी चूना पत्थर ब्लॉक है। संडी, विचारपुर, पंडरिया, बुंदेली और भरदागोंड में फैले 404 हेक्टेयर के इस ब्लॉक का आवंटन श्री सीमेंट लिमिटेड को किया गया है। यह क्षेत्र पहले से ही खनन विरोधी आंदोलन के लिए जाना जाता है और स्थानीय लोगों का कहना है कि इससे खेती और पेयजल स्रोत सबसे अधिक प्रभावित होंगे।

लौह अयस्क के मामले में जिले में चार बड़े ब्लॉकों का चिन्हांकन हुआ है जिनमें सबसे बड़ा गोपालटोला ब्लॉक है, जो 1217 हेक्टेयर में फैला है और इसे जोडिक डीलर्स प्राइवेट लिमिटेड को आवंटित किया गया है। वहीं, भांजी-डोंगरी ब्लॉक 392 हेक्टेयर के साथ दूसरा सबसे बड़ा खनन क्षेत्र है, जो सागर स्टोन इंडस्ट्री को सौंपा गया है। इसके अलावा गोघाटोला ब्लॉक (281 हेक्टेयर) बालाजी मिनरल्स को तथा नचनिया ब्लॉक (200 हेक्टेयर) एएलपीएस माइनिंग सर्विस प्राइवेट लिमिटेड को आवंटित किया गया है। इन चारों ब्लॉकों के माध्यम से हजारों हेक्टेयर में खनन शुरू होने से जहां एक ओर औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की संभावना जताई जा रही है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण, जंगलों और स्थानीय जल स्रोतों पर पड़ने वाले गंभीर प्रभाव को लेकर चिंताएं भी तेजी से बढ़ रही हैं।

जंगल कटेंगे, जल स्रोत सूखेंगे: पर्यावरण पर दोहरा संकट

खनन विस्तार की इस योजना ने पर्यावरणविदों और स्थानीय नागरिकों की चिंता बढ़ा दी है। इतने बड़े पैमाने पर खनन शुरू होने से हजारों पेड़ों की कटाई तय मानी जा रही है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इससे इलाके का पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर रूप से प्रभावित होगा। भूजल स्तर गिरने से जल स्रोत सूख सकते हैं, जिससे कृषि और पेयजल संकट गहरा जाएगा।

क्षेत्र के एक वरिष्ठ पर्यावरण कार्यकर्ता ने बताया, यहां पहले से ही जल संकट की समस्या है। बिना सोचे-समझे खनन की इतनी बड़ी परियोजनाओं को मंजूरी देना आत्मघाती कदम है। जंगलों के बिना यह क्षेत्र रेगिस्तान में तब्दील हो सकता है।

रोजगार का वादा बनाम स्वास्थ्य संकट

खनन परियोजनाओं के पक्ष में सरकार और कंपनियों का तर्क है कि इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और जिले का आर्थिक विकास होगा। हालांकि, ग्रामीण इस तर्क को खारिज करते हुए सवाल उठाते हैं कि खनन से होने वाले प्रदूषण, धूल और स्वास्थ्य समस्याओं का क्या होगा?

स्थानीय निवासी राजेंद्र साहू ने बताया, "हमारे यहां पहले से ही स्वास्थ्य सुविधाएं न के बराबर हैं। खदानें शुरू होने के बाद लोग सांस और त्वचा की बीमारियों से ग्रस्त हो जाएंगे। कंपनियों को रोजगार देना है तो वो खनन के बजाय अन्य उद्योग लगाएं।"

ग्रामीणों में बढ़ा असंतोष, विरोध के स्वर तेज

संडी क्षेत्र में पहले से चल रहा विरोध अब अन्य ब्लॉकों में भी फैलने के संकेत दे रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि इतनी बड़ी परियोजनाओं को लागू करने से पहले न तो उनकी सहमति ली गई और न ही पारदर्शी तरीके से जानकारी साझा की गई। कई जगहों पर जनसुनवाई की प्रक्रिया को भी सिरे से नजरअंदाज किया जा रहा है।

स्थानीय किसान नेता महेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा, "हम विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन यह विकास हमारी जमीन, जंगल और पानी की कीमत पर नहीं होना चाहिए। अगर प्रशासन नहीं सुनेगा तो हम आंदोलन करने को मजबूर होंगे।"

प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती: संतुलन कैसे बनेगा?

जिला प्रशासन का कहना है कि पर्यावरणीय मानकों का पालन सुनिश्चित करने के बाद ही खनन की अनुमति दी जाएगी। हालांकि, इतने बड़े स्तर पर खनन क्षेत्र चिन्हित होने और कंपनियों को आवंटन हो जाने के बाद यह भरोसा ग्रामीणों को सहज नहीं कर पा रहा है।