5 साल में 103.54 करोड़ों खर्च, फिर भी गाय सड़क पर! नस्ल सुधार की फाइलें मोटी, पशुपालक की हालत खोटी
रिपोर्टर उमेश्वर वर्मा
नस्ल सुधार से लेकर इलाज तक सवालों में व्यवस्था, करोड़ों खर्च के बावजूद पशुपालक परेशान
खैरागढ़. खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (केसीजी) और मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी (एमएमसी) नए जिले 2022-23 में बनने के बाद भी लंबे समय तक पशु चिकित्सा विभाग की वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था राजनांदगांव उपसंचालक कार्यालय के नियंत्रण में रही। उपलब्ध आरटीआई एवं विभागीय दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2022-23 से 2025-26 तक करीब 103.54 करोड़ रुपए खर्च किए गए। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर पशुपालन और पशु स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। पशुपालकों का कहना है कि बीमार पशुओं के इलाज का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा है, नस्ल सुधार का अपेक्षित लाभ नहीं दिख रहा और कई क्षेत्रों में पशु चिकित्सा सेवाएं पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे में करोड़ों रुपए के खर्च और जमीन पर दिख रहे परिणामों के बीच बड़ा अंतर नजर आ रहा है।

दवा खरीदी पर 4.23 करोड़, चिकित्सा प्रतिपूर्ति में 64.32 लाख
दस्तावेजों के अनुसार दवाइयों की खरीदी के नाम पर 4,23,99,602 रुपए खर्च किए गए। वहीं चिकित्सकीय उपकरण पर 12,94,340 रुपए, चिकित्सा व्यय प्रतिपूर्ति पर 64,32,314 रुपए, विशेष सेवाओं पर 2,47,000 रुपए, मशीन तथा उपकरण खरीदी पर 24,985 रुपए और शत-प्रतिशत पोषित योजनाओं के नाम पर 60,000 रुपए खर्च दर्ज हैं। दवाइयों पर करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद कई पशु औषधालयों में स्टाफ की कमी के कारण नियमित सेवा नहीं मिल पाने की शिकायतें हैं। ऐसे में खरीदी गई दवाइयां किस संस्था को कितनी मिलीं और कितने पशुओं के इलाज में उपयोग हुईं, इसका भौतिक सत्यापन महत्वपूर्ण हो जाता है।
अनुदान के नाम पर 4.73 करोड़, व्यक्तिगत अनुदान में 1.53 करोड़
आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार अन्य अनुदान के नाम पर 4,73,99,426 रुपए खर्च हुए। इसके अलावा व्यक्तिगत अनुदान देने के नाम पर 1,53,60,025 रुपए, प्रत्यक्ष रूप से किसानों को सहायता के नाम पर 7,87,500 रुपए और प्रशिक्षण के नाम पर 51,20,000 रुपए खर्च किए गए। इसी तरह मेला, उत्सव एवं प्रदर्शनी पर 17,70,000 रुपए तथा अन्य व्यय पर 14,83,374 रुपए खर्च दर्ज है। अन्य आकस्मिक मजदूरी पर 11,05,274 रुपए और अन्य आकस्मिक व्यय पर 4,76,286 रुपए खर्च किए गए। इन योजनाओं और अनुदानों का उद्देश्य पशुपालकों को लाभ पहुंचाना है, लेकिन पशुपालकों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है।

वेतन में 61.14 करोड़, महंगाई भत्ते में 25.59 करोड़
दस्तावेजों में वेतन के नाम पर 61,14,88,096 रुपए खर्च दर्ज हैं। वहीं महंगाई भत्ते पर 25,59,51,028 रुपए, मकान किराया भत्ते पर 2,88,98,385 रुपए और अन्य भत्तों पर 33,78,012 रुपए खर्च किए गए। त्योहार अग्रिम के नाम पर 20,90,000 रुपए तथा आदिवासी क्षेत्र भत्ते पर 1,35,236 रुपए खर्च हुए। इसके अलावा यात्रा भत्ता-दौरे आदि पर 11,28,078 रुपए, यात्रा भत्ता पर 19,300 रुपए, स्थायी यात्रा भत्ता पर 20,13,200 रुपए और स्थानांतरण यात्रा भत्ता पर 23,310 रुपए खर्च दर्ज है। यानी कर्मचारियों के वेतन-भत्तों पर ही करोड़ों रुपए खर्च हुए, लेकिन दूसरी ओर फील्ड में स्टाफ की कमी की शिकायत बनी हुई है।
पेट्रोल से फर्नीचर तक लाखों खर्च, कार्यालय संचालन भी महंगा
विभागीय रिकॉर्ड में पेट्रोल-तेल आदि पर 15,66,711 रुपए, फर्नीचर एवं कार्यालय उपकरण खरीदी पर 6,91,655 रुपए, मोटर गाड़ी खरीदी एवं अन्य पर 5,22,582 रुपए, लेखन सामग्री एवं फार्मों की छपाई पर 4,76,741 रुपए, वर्दी खरीदी पर 7,46,176 रुपए, सूचना प्रौद्योगिकी पर 4,59,403 रुपए, बिजली एवं जल प्रभार पर 16,19,319 रुपए तथा दूरभाष पर 1,21,743 रुपए खर्च दर्ज है। डाक-तार पर 51,600 रुपए, पुस्तकों एवं नियतकालीन पत्रिकाओं पर 9,915 रुपए, गैर-कार्यालयीन फर्नीचर पर 40,000 रुपए, डीकी धन का भुगतान (भारित) पर 95,000 रुपए तथा मेला-उत्सव-प्रदर्शनी पर 17.70 लाख रुपए खर्च हुए हैं। खर्च की यह लंबी सूची बताती है कि विभागीय व्यवस्था में अलग-अलग मदों में लगातार राशि खर्च होती रही।
खर्च की लंबी फेहरिस्त, लेकिन पशुपालक को लाभ कितना?
दस्तावेजों में अन्य प्रशिक्षण 51,20,000 रुपए, अन्य व्यय 14,83,374 रुपए, व्यक्तिगत अनुदान 1,53,60,025 रुपए, अन्य अनुदान 4,73,99,426 रुपए और दवा खरीदी 4,23,99,602 रुपए जैसी बड़ी राशियां दर्ज हैं। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में पशु कमजोर होने, बीमारी की स्थिति में निजी डॉक्टरों पर निर्भरता और सरकारी पशु चिकित्सा केंद्रों के नियमित संचालन को लेकर शिकायतें सामने आ रही हैं। खर्च होना अपने आप में अनियमितता नहीं है, लेकिन इतने बड़े खर्च के बाद उसका जमीनी परिणाम भी दिखाई देना चाहिए। यदि पशुपालक आज भी इलाज और नस्ल सुधार के लिए परेशान हैं तो खर्च और परिणाम के बीच के अंतर की समीक्षा जरूरी है।
नए जिले बने, लेकिन चार साल तक राजनांदगांव से चलता रहा विभाग का हिसाब-किताब
केसीजी और एमएमसी के नवीन जिला बनने के बाद भी वर्ष 2022-23 से 2025-26 तक करीब चार वर्षों तक दोनों जिलों के पशु विभाग से जुड़े भुगतान और विभागीय कार्यों का नियंत्रण राजनांदगांव उपसंचालक कार्यालय के पास रहने की जानकारी सामने आई है। अब हाल ही में दोनों जिलों को डीडीओ पावर मिलने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में पांच वर्षों में खर्च हुए 103.54 करोड़ रुपए के साथ यह भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस राशि का कितना वास्तविक लाभ पशुपालकों और पशुधन को मिला, आखिर करोड़ों के खर्च के बाद भी यदि पशुपालक इलाज, टीकाकरण और नस्ल सुधार के लिए परेशान हैं तो पैसा खर्च होने और उसका असर जमीन पर दिखने के बीच की कड़ी आखिर कहां टूट रही है?




